कविता दोहा सोरठा ,छंद गज़ल और गीत;
तेरे तक आते सभी ,रास्ते ये मनमीत .
रसते ये मनमीत ,सरस सुकुमार सुकोमल .
पल भर भी न हों, कभी धडकन से ओझल
मन-मन्दिर से बहे निरंतर भावुक सरिता .
तू है तू ही तू मेरी सम्पूर्ण कविता .
दीप जीरवी
http://deepkavyaanjli.blogspot.com/
Read in your own script
Roman(Eng)
ગુજરાતી
বাংগ্লা
ଓଡ଼ିଆ
ਗੁਰਮੁਖੀ
తెలుగు
தமிழ்
ಕನ್ನಡ
മലയാളം
हिन्दी
Via chitthajagat.in
हाँ मै ने भी किया है प्रेम, मै ने भी पिया है प्रेम रस ;
मेरी प्रेयसी नित नूतन सद सनातन ;किन्तु पुरातन
कोमल भाव की सरस सरिता ,निज चेतना निज प्रेयसी .
मंथर कभी तीर्व कभी ,होती है चंचल सी गति .
निज प्रेयसी निज चेतना ;
प्रथम प्रेम का प्रथम पल्लव ,पल्लवित कुसमित प्रेम अविलम्बित .
निज धारणा निज चेतना ,प्रखर गुंजन से गुंजित ,
वल्लरी प्रेम कुसुम सुरभित ,अमर प्रेम की सी थाती .
प्रेम दीप की वो बाती;निज चेतना प्रिय चेतना
deepzirvi@yahoo.co.in
----------------------------------------------------------
कौन सी स्वतन्त्रता के जश्न मना रहे हैं हम
एक और पन्द्रह अगस्त आया .देश विदेश में सरकारी/गैर सरकारी आयोजनों की भरमार ,धूम धडाका /हो-हल्ला /दूर-दर्शनीय देश प्रेम/और.. फिर बस...
करोडों फूंक कर आयोजित औपचारिक समागमों का तमाम ताम झाम किस लिए ??
किस स्वतन्त्रता का जश्न मनाएं ??
आज भारत की आर्थिकता वर्ल्ड बैंक की रखेइल बन चुकी है..कुटीर उद्योगों के गले में डबल्यू टी ओ का फंडा पडा हुआ है ..शिक्षा स्वास्थ्य इत्यादि सभी विभागों का निजीकरण अवश्यम्भावी है ...विश्वी कर्ण की आंधी में भारतीय सदगुण लुप्त होते दिखाई दे रहे हैं ...
कहाँ है स्वतन्त्रता ?!
क्या मात्र तन की स्वतन्त्रता ही स्वतन्त्रता है?? हमारी सोच ,हमारी मानसिकता तो आज भी परतंत्र है...हमारी मानसिकता तो आज भी पश्चिम की गुलाम है...अपनी अमीर धरोहर को भूल कर पश्चिम का अन्धानुकर्ण करना हमारा स्वभाव बन चुका है...
-हम किसी भी तथ्य को तथ्य एवम सत्य को सत्य तभी मानते हैं जब पश्चिम उसे सत्यापित करता है .
जब दिल ज़हन गुलाम है तो ... जब सोच परतंत्र है तो.. स्वतन्त्रता दिवसों के औपचारिक समागमों का क्या लाभ ?!सच्ची स्वतन्त्रता अभी आनी है...
-वह भोर जब हमे अपनी धरोहर पर गर्व होगा ...
-हम स्वयम को हिन्दुस्तानी मानने पर गर्व करें गे ...
-जब विदेशों की गुलामी मोल खरीदने की जगह हम अपने भारत की सेवा को सर्वोपरि मानेंगे ...
-तब हो गी सची स्व तंत्रता ....