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28 February, 2012

कविता दोहा सोरठा ,छंद गज़ल और गीत;
तेरे तक आते सभी ,रास्ते ये मनमीत .
रसते ये मनमीत ,सरस सुकुमार सुकोमल .
पल भर भी न हों, कभी धडकन से ओझल
मन-मन्दिर से बहे निरंतर भावुक सरिता .
तू है तू ही तू मेरी सम्पूर्ण कविता .
दीप जीरवी

26 February, 2012

बड़े बड़ाई खुद करे बोलें बड़के -बोल 
'कलयुग' में कंकर कहें लाख तको मोरा मोल .

-
ऊंचे पेड़ खजूर के फल लागो अति दूर ;
'कलयुग' मोल खरीद के खाए जात खजूर .
-
पलक ढांप तब लेत थे आंखन पिऊ छिपाय;
'कलयुग' उघडे बदन ले अब तितली उड़ जाय.
-
बिकती जाने कलम जो महामूर्ख तिन जान .
कलयुग क्या हर युग रहे ,अनमोलक विद्वान .
-
'लक्ष्मी ' 'सरस्वती' से कभी चाकरी न करवाय.

सरस्वती लक्ष्मी से अधिक मान धन पर प् जाए .
--
दीप जीरवी .

भाव निर्झर -१ 
तुम हो मैं हूँ और ख़ामोशी
 झूमते पीपल पेड़ तले ;

चांदनी रात सलोनी महके ,
चुपके छुपके ख्वाब पले.

सरगोशी से हवा नशीली ,
कानों में कुछ बात करे ,

हमको हाथ पकड़ ले जाएँ
 तेरे सपने चाँद-परे.

आँख मिचौनी खेले जब हम ,
 मुझको तेरा साथ मिले 

बरसों बीते इस आशा में 
विश्वासों के दीप जले 

दीप जीरवी 

ਬਲਜੀਤਪਾਲ ਸਿੰਘ